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Aarti Dwarkadheesh Ki — आरती द्वारकाधीश की
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आरती द्वारकाधीश की — Dwarkadheesh Krishna Aarti
आरती द्वारकाधीश की, जय द्वारकाधीश हरे।
चरणों में तेरे प्रभु, चरणों में तेरे प्रभु,
सब जग जन सुख भरे॥ आरती द्वारकाधीश की॥
द्वारका नगरी के वासी, सोने की नगरी बसाई।
जय द्वारकाधीश हरे।
सोलह सहस्र रानियाँ शोभें, सोलह सहस्र रानियाँ शोभें,
रुक्मिणी रानी सुहाई॥ आरती द्वारकाधीश की॥
सुदामा के प्रीत निभाई, दरिद्र दूर किया।
जय द्वारकाधीश हरे।
तनखा चावल को स्वीकारा, तनखा चावल को स्वीकारा,
मित्र धर्म का दिया॥ आरती द्वारकाधीश की॥
गीता ज्ञान दिया अर्जुन को, रणभूमि में खड़े।
जय द्वारकाधीश हरे।
धर्म की रक्षा हेतु प्रभु, धर्म की रक्षा हेतु प्रभु,
कौरव दल संहारे॥ आरती द्वारकाधीश की॥
यदा यदा ही धर्मस्य, ग्लानिर्भवति भारत।
जय द्वारकाधीश हरे।
अभ्युत्थानमधर्मस्य, अभ्युत्थानमधर्मस्य,
तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ आरती द्वारकाधीश की॥
कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचन।
जय द्वारकाधीश हरे।
गीता सार यही प्रभु का, गीता सार यही प्रभु का,
कर्म करो फल की चिन्ता न करो॥ आरती द्वारकाधीश की॥