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आरती श्री नाथजी की — कृष्ण आरती
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जय श्रीनाथजी प्रभु, जय श्रीनाथजी।
गोवर्धन गिरिधारी, जय श्रीनाथजी॥
नाथद्वारा में विराजत, श्रीनाथजी भगवान।
पुष्टिमार्ग के आधार, वल्लभ कुल सम्मान॥
जय श्रीनाथजी॥
गोवर्धन पर्वत उठाया, एक अंगुली माहीं।
इन्द्र का मान मर्दन कर, ब्रज को रखा सलाही॥
जय श्रीनाथजी॥
मुखारविन्द पर शोभित, हीरा मोती हार।
श्रृंगार रस में भीने, नित नूतन अवतार॥
जय श्रीनाथजी॥
अन्नकूट का भोग लगे, छप्पन भोग सजाए।
माखन मिश्री दूध दही, नन्दलाल मुसकाए॥
जय श्रीनाथजी॥
श्रीनाथजी की आरती, जो कोई नित गावे।
पुष्टिमार्ग की कृपा पाकर, गोलोक धाम सिधावे॥
जय श्रीनाथजी॥