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जय देवउठनी एकादशी, जागे भगवान।
चार मास की निद्रा से, विष्णु उठे महान॥
जय प्रबोधिनी एकादशी, जय हरि उठे आज॥
कार्तिक शुक्ल एकादशी, देवउठनी कहलाती।
आषाढ़ शयनी के बाद, आज प्रभु की जागती।
चार मास चातुर्मास, क्षीरसागर में सोये।
आज विष्णु भगवान जागे, जगत मंगल होये॥
जय प्रबोधिनी एकादशी, जय हरि उठे आज॥
आज से शुभ कार्य शुरू, विवाह मुहूर्त निकले।
गृह प्रवेश और यज्ञ हवन, सब शुभ काम चले।
तुलसी विवाह भी आज होता, शालिग्राम के संग।
देव जागृति का उत्सव, भक्ति का अनुपम रंग॥
जय प्रबोधिनी एकादशी, जय हरि उठे आज॥
शंख चक्र गदा पद्म धारी, विष्णु जगे आज।
भक्तन की सुनो अब प्रभु, करो सबका काज।
देवउठनी आरती गाओ, हरि नाम जपो।
प्रबोधिनी एकादशी पर, भक्ति में तुम रमो॥
जय देवउठनी एकादशी, जागे भगवान।
चार मास की निद्रा से, विष्णु उठे महान॥