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जय द्वारकाधीश प्रभु, जय रणछोड़ राय।
कृष्ण नगरी द्वारका में, भक्ति रस बरसाय॥
जय द्वारकाधीश, जय रणछोड़ राय॥
सोने की नगरी द्वारका, सागर तट पर सोहे।
गोमती संगम पवित्र जल, मन को हर ले मोहे।
श्रीकृष्ण ने बसाई नगरी, मथुरा छोड़ आये।
चार धाम में पश्चिम धाम, मोक्ष द्वार कहलाये॥
जय द्वारकाधीश, जय रणछोड़ राय॥
पंचधातु का ध्वज फहरे, सात मंजिला मन्दिर।
जगत मन्दिर की शोभा, न्यारी भव्य अति सुन्दर।
चाँदी के सिंहासन पर, कृष्ण विराजे काले।
चतुर्भुज शंख चक्र गदा, पद्म हाथ में वाले॥
जय द्वारकाधीश, जय रणछोड़ राय॥
बेट द्वारका में गोपी, चन्दन का तिलक।
रुक्मिणी मन्दिर शोभा, भक्ति अद्भुत विलक्षण।
सागर आरती सन्ध्या की, दीप हजारों जलते।
द्वारकाधीश की आरती में, भक्तजन सब गलते॥
जय द्वारकाधीश प्रभु, जय रणछोड़ राय।
कृष्ण नगरी द्वारका में, भक्ति रस बरसाय॥