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पलनी मुरुगन आरती — क्षेत्रीय देवता आरती
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जय पलनी आण्डवर, जय दण्डायुधपाणि।
तपस्वी बालक रूप में, तू ज्ञान की खानी॥
वेल मुरुगा पलनी वासा, वेल मुरुगा पलनी वासा॥
पलनी मलाई पर्वत पर, मुरुगन विराजे।
दण्डायुधपाणि रूप में, कौपीन धारे साजे।
सब त्याग कर सन्यासी बने, गणपति से रूठकर।
ज्ञान फल की कथा सुनकर, तप करे पहाड़ पर॥
वेल मुरुगा पलनी वासा, वेल मुरुगा पलनी वासा॥
नवपाषाण मूर्ति शोभे, बोगर सिद्धर ने बनाई।
नौ जड़ी बूटियों से गढ़ी, अमृत शक्ति पाई।
पंचामृत अभिषेकम् से, मूर्ति और चमके।
कावड़ी अट्टम तमिल भक्ति, पालकोड़न पर भजके॥
वेल मुरुगा पलनी वासा, वेल मुरुगा पलनी वासा॥
थाईपूसम पर्व विशेष, भक्ति चरम पर होती।
काविड़ उठाकर पहाड़ चढ़ें, शरीर में वेल खोंती।
पलनी मुरुगन आरती गाओ, दण्डपाणि को पूजो।
त्याग तपस्या ज्ञान की मूर्ति, मुरुगन में सब खोजो॥
जय पलनी आण्डवर, जय दण्डायुधपाणि।
तपस्वी बालक रूप में, तू ज्ञान की खानी॥