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श्री रामानुज चालीसा
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श्रीमते रामानुजाय नमः!
॥ दोहा ॥
श्री रामानुज पद कमल सुमिरि ज्ञान मति पाँय।
चालीसा सादर पढूँ रामानुज यश गाय॥
ज्ञान भक्ति वैराग्य के पुंज श्री रामानुजराय।
नमो नमो श्री गुरुदेव चरणन शीश नवाँय॥
॥ चौपाई ॥
जयति जयति श्री रामानुज स्वामी। ज्ञानभक्तिवैराग्य अनुगामी॥
श्रीपेरम्बदूर में प्रकटे आप। तात-तात कर हरत संताप॥
केशव सोमयाजी पितु नामा। कान्तिमती मातु सुत लामा॥
बालकपन में अद्भुत ज्ञाना। देखि पण्डित भये हैरान॥
कांचीपुर में ज्ञान बढाया। यामुनाचार्य के सुयश सुनाया॥
रंगनाथ के सेवक भाए। सब जन के मन हर्षाए॥
भाष्यकार तुम ज्ञान विधाता। ब्रह्मसूत्र के अर्थ के दाता॥
विशिष्टाद्वैत पन्थ चलायो। ज्ञानदीप सब जन में जलायो॥
समता का संदेश सुनायो। जाति-पाति को भेद मिटायो॥
यतिराज तुम परम प्रतापी। हरहु हमारे पाप संतापी॥
वैष्णव जन के तुम हौ प्यारे। भवसागर से करहु निवारे॥
नर नारायण रूप कहाए। श्रीरंग में आसन बनाए॥
श्री सम्प्रदाय के तुम गुरुदेवा। नित्य करूँ मैं तव पद सेवा॥
राम नाम को मंत्र सुनैयो। सब जग में आनन्द फैलायो॥
दुष्टन को सत्पथ दरसायो। ज्ञान की महिमा जगत बढाओ॥
जय जय जय श्री गुरुदेव स्वामी। रामानुज प्रभु अन्तरयामी॥
दीन जानि मोहिं अपनाई। शरण गहे की लाज बचाई॥
जो यह रामानुज चालीसा गावे। सब मनवांछित फल सो पावे॥
मानसिक ताप मिट जावे। जो निसिदिन ध्यान लगावे॥
यतिराज के चरण कमल में। वास सदा ही पावे॥
॥ दोहा ॥
रामानुज पद ध्यान धरि पाठ करे चित लाय।
रामदास प्रभु की कृपा अवसि भक्ति को पाय॥
जय श्री रामानुज स्वामी की जय!