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अहोई अष्टमी व्रत कथा

🪔संकल्प
🌺विधि
📖कथा
आरती

अहोई अष्टमी व्रत कथा

📅 Kartik Krishna Paksha Ashtami

🕯️ व्रत का भाव

व्रत केवल उपवास नहीं, संकल्प और श्रद्धा का संगम है। कुछ क्षण शांत बैठें, गहरी साँस लें और मन को एकाग्र करें। सच्चे भाव से लिया गया व्रत ही फल देता है।

साँस लें

🙏 व्रत संकल्प

अपना नाम व स्थान भरें और संकल्प मन में दोहराएँ — “मैं यह व्रत श्रद्धा और भक्ति से धारण करता/करती हूँ।”

आज, [स्थान] में, मैं [नाम], पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ अहोई अष्टमी व्रत कथा धारण करता/करती हूँ। माता-पिता, परिवार और प्रियजनों के कल्याण, सुख और मंगल की कामना करता/करती हूँ।

🌺 अहोई अष्टमी पूजा विधि

व्रत आरंभ करने से पूर्व यह विधि पढ़ें — पूजा की तैयारी, नियम और क्रम।

प्रातः स्नान करके संकल्प लें। दिनभर व्रत रखें। शाम को दीवार या कागज पर अहोई माता, स्याहू और बच्चों का चित्र बनाएं या स्थापित करें। रोली, अक्षत, जल, पुष्प, दूध-चावल और दीप से पूजा करें। कथा सुनें। संतान की रक्षा की प्रार्थना करें। परंपरा के अनुसार तारों या चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण करें।
🙏

कथा श्रवण करें

दीपक जलाएँ, शांत मन से बैठें और श्रद्धापूर्वक कथा सुनें।

प्रेम से बोलिए अहोई माता की जय। स्याहू माता की जय। माता पार्वती की जय।

भक्तों, कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को अहोई अष्टमी का पावन व्रत किया जाता है। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य, सुख, सुरक्षा और उज्ज्वल भविष्य के लिए करती हैं। इस दिन अहोई माता, स्याहू माता और माता पार्वती का ध्यान करके कथा सुनी जाती है। अब मन को शांत करके श्रद्धा से अहोई माता की यह पावन व्रत कथा सुनिए।

प्राचीन काल की बात है। एक नगर में एक धनवान साहूकार रहता था। उसके सात पुत्र थे और सातों पुत्रों का विवाह हो चुका था। घर में सात बहुएं थीं और परिवार सुख-समृद्धि से भरा हुआ था। दीपावली का त्योहार आने वाला था। पुराने समय में दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लाई जाती थी। इसलिए साहूकार की पत्नी अपनी बहुओं के साथ नगर के बाहर खदान में मिट्टी खोदने गई।

जहां वे मिट्टी खोद रही थीं, उसी स्थान पर एक सेह, जिसे स्याहू भी कहा जाता है, की मांद थी। उस मांद में स्याहू अपने छोटे-छोटे बच्चों के साथ रहती थी। साहूकार की पत्नी ने अनजाने में कुदाल चलाई और कुदाल स्याहू के एक बच्चे को लग गई। वह बच्चा वहीं मर गया। यह देखकर स्याहू माता बहुत दुखी हुईं। अपने बच्चे की मृत्यु से व्याकुल होकर उन्होंने साहूकारनी को श्राप दिया कि जैसे आज मैं अपनी संतान के दुख से तड़प रही हूं, वैसे ही तू भी अपनी संतानों के दुख से तड़पेगी।

साहूकारनी बहुत दुखी हुई। उसने जान-बूझकर कोई पाप नहीं किया था, फिर भी उसके हाथों एक जीव की संतान की मृत्यु हो गई थी। वह शोक करती हुई घर लौट आई। कुछ समय के बाद उसके एक पुत्र की मृत्यु हो गई। फिर दूसरा पुत्र चला गया। इसी प्रकार देखते-देखते उसके सातों पुत्र मृत्यु को प्राप्त हो गए। जिस घर में पहले खुशियां थीं, वहां रोना-पीटना शुरू हो गया। सातों बहुएं विधवा हो गईं और साहूकारनी पश्चाताप में डूब गई।

एक दिन पड़ोस की वृद्ध और धर्मपरायण स्त्रियां उसके पास आईं। साहूकारनी ने रोते हुए उन्हें सारी बात बताई कि उसने जान-बूझकर कोई पाप नहीं किया, परंतु मिट्टी खोदते समय अनजाने में स्याहू के बच्चे की मृत्यु हो गई थी। यह सुनकर उन स्त्रियों ने कहा कि बहन, तूने अपना अपराध स्वीकार कर लिया है। सच्चा पश्चाताप आधे पाप को नष्ट कर देता है। अब तू कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन अहोई माता का व्रत कर। दीवार पर अहोई माता, स्याहू और उसके बच्चों का चित्र बनाकर पूजा कर। अहोई माता से क्षमा मांग और अपनी संतान की रक्षा की प्रार्थना कर। माता अवश्य कृपा करेंगी।

साहूकारनी ने श्रद्धा से व्रत का संकल्प लिया। कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन उसने प्रातः स्नान किया, घर को शुद्ध किया और दिन भर निर्जला व्रत रखा। शाम के समय उसने दीवार पर गेरू से अहोई माता और स्याहू के बच्चों का चित्र बनाया। उसने कलश स्थापित किया, रोली, अक्षत, पुष्प, जल, दूध-चावल और श्रद्धा से माता का पूजन किया। पूजा करते समय वह बार-बार रोकर कहती रही कि हे अहोई माता, मुझसे अनजाने में अपराध हुआ है, मेरी भूल क्षमा करो और मेरी संतानों पर कृपा करो।

रात में तारों को अर्घ्य देकर उसने व्रत पूरा किया। उसकी सच्ची श्रद्धा और पश्चाताप देखकर अहोई माता प्रसन्न हुईं। माता ने उसे आशीर्वाद दिया। अहोई माता की कृपा से साहूकारनी के सातों पुत्र फिर से जीवित हो गए। घर में फिर से मंगल ध्वनि होने लगी, बहुओं का सुहाग लौट आया और साहूकार का परिवार फिर से सुखी हो गया।

भक्तों, इस कथा से यह शिक्षा मिलती है कि अनजाने में हुए पाप का भी फल मिलता है, परंतु सच्चा पश्चाताप, ईश्वर पर श्रद्धा और विधिपूर्वक व्रत-पूजन से माता की कृपा अवश्य प्राप्त होती है। जो माताएं अहोई अष्टमी का व्रत श्रद्धा से करती हैं, अहोई माता उनकी संतानों की रक्षा करती हैं, घर में सुख-सौभाग्य देती हैं और संतान को दीर्घायु का आशीर्वाद देती हैं।

प्रेम से बोलिए अहोई माता की जय। स्याहू माता की जय। माता पार्वती की जय।
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व्रत सम्पन्न

आपकी श्रद्धा और संकल्प स्वीकार हों। 🙏

🪔

अहोई माता की आरती

जय अहोई माता, जय अहोई माता।
तुमको निशिदिन सेवत हरि विष्णु विधाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥

ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला, तू ही है जगमाता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥

माता रूप निरंजन, सुख-सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, नित मंगल आता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥

तू ही पाताल वसंती, तू ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव प्रकाशक, जगनिधि से त्राता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥

जिस घर थारो बासो, वाही में गुण आता।
कर न सके सोई कर ले, मन नहीं घबराता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥

तुम बिन सुख न होवे, पुत्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, तुम बिन नहीं आता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥

शुभ गुण सुंदर मुक्ता, क्षीरनिधि जाता।
रत्न चतुर्दश तोकूं, कोई नहीं पाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥

श्री अहोई माँ की आरती, जो कोई भी गाता।
उर उमंग अति उपजे, पाप उतर जाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
आशीर्वाद
जिस भाव और श्रद्धा से आपने यह व्रत धारण किया, वह सफल हो। आपके घर में सुख, समृद्धि, आरोग्य और शांति का वास हो। ॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥