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ॐ
अहोई अष्टमी व्रत कथा 2
📅 Kartik Krishna Paksha Ashtami🕯️ व्रत का भाव
व्रत केवल उपवास नहीं, संकल्प और श्रद्धा का संगम है। कुछ क्षण शांत बैठें, गहरी साँस लें और मन को एकाग्र करें। सच्चे भाव से लिया गया व्रत ही फल देता है।
साँस लें
🙏 व्रत संकल्प
अपना नाम व स्थान भरें और संकल्प मन में दोहराएँ — “मैं यह व्रत श्रद्धा और भक्ति से धारण करता/करती हूँ।”
आज, [स्थान] में, मैं [नाम], पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ अहोई अष्टमी व्रत कथा 2 धारण करता/करती हूँ। माता-पिता, परिवार और प्रियजनों के कल्याण, सुख और मंगल की कामना करता/करती हूँ।
🌺 अहोई अष्टमी पूजा विधि
व्रत आरंभ करने से पूर्व यह विधि पढ़ें — पूजा की तैयारी, नियम और क्रम।
प्रातः स्नान करके संकल्प लें। दिनभर व्रत रखें। शाम को अहोई माता, स्याहू और बच्चों का चित्र बनाकर पूजा करें। कथा सुनें। संतान की रक्षा की प्रार्थना करें। परिवार की परंपरा के अनुसार तारों या चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत पूर्ण करें।
🙏
कथा श्रवण करें
दीपक जलाएँ, शांत मन से बैठें और श्रद्धापूर्वक कथा सुनें।
प्रेम से बोलिए अहोई माता की जय। स्याहू माता की जय। सुरही गौ माता की जय।
भक्तों, अहोई अष्टमी के दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा, दीर्घायु और सुख के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत की कई लोक-परंपराएं प्रचलित हैं। अब श्रद्धा और शांत मन से अहोई अष्टमी की वह प्रसिद्ध कथा सुनिए, जिसमें छोटी बहू के त्याग, सेवा और माता की कृपा का वर्णन है।
प्राचीन काल में एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे, सात बहुएं और एक लाडली कुंवारी बेटी थी। दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लाने की परंपरा थी। कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन साहूकार की सातों बहुएं अपनी ननद के साथ जंगल में मिट्टी खोदने गईं।
जहां वे मिट्टी खोद रही थीं, वहीं एक स्याहू माता की मांद थी। उस मांद में स्याहू माता अपने बच्चों के साथ रहती थीं। मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से अनजाने में स्याहू माता का एक बच्चा मर गया। स्याहू माता बहुत दुखी और क्रोधित हुईं। उन्होंने कहा कि तूने मेरे बच्चे को मारा है, अब मैं तेरी कोख बांध दूंगी।
ननद यह सुनकर डर गई। वह अपनी भाभियों से बोली कि भाभी, तुममें से कोई मेरे बदले यह दोष और श्राप अपने ऊपर ले लो। बड़ी भाभियों ने मना कर दिया। छोटी बहू दयालु थी। उसने सोचा कि ननद अभी कुंवारी है। यदि उसकी कोख बंध गई तो उसका भविष्य दुखमय हो जाएगा। ननद की रक्षा के लिए छोटी बहू ने वह श्राप अपने ऊपर ले लिया।
श्राप का प्रभाव यह हुआ कि छोटी बहू को जब भी संतान होती, वह सातवें दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाती। इस प्रकार उसके सात पुत्र जन्म लेकर चले गए। छोटी बहू अत्यंत दुखी हुई। उसने एक पंडित से उपाय पूछा। पंडित जी ने कहा कि तू सुरही गाय की सेवा कर। उसकी कृपा से तुझे मार्ग मिलेगा।
छोटी बहू प्रतिदिन प्रातः उठकर बिना किसी को बताए सुरही गाय के स्थान पर जाती। वह वहां सफाई करती, सेवा करती और चुपचाप लौट आती। कई दिनों तक ऐसा होता रहा। एक दिन सुरही गौ माता ने सोचा कि कौन मेरी इतनी प्रेम से सेवा करता है। अगली सुबह उन्होंने छोटी बहू को सेवा करते देखा। गौ माता प्रसन्न हुईं और बोलीं कि बेटी, तूने मेरी सच्ची सेवा की है, बता तुझे क्या चाहिए।
छोटी बहू ने हाथ जोड़कर कहा कि माता, स्याहू माता आपकी सहेली हैं। उनके श्राप के कारण मेरी संतान जीवित नहीं रहती। यदि आप मुझे उनसे मिलवा दें और वे प्रसन्न हो जाएं, तो मेरी संतान बच सकती है। सुरही गौ माता ने करुणा करके उसे अपने साथ स्याहू माता के पास ले चलने का वचन दिया।
गौ माता छोटी बहू को लेकर चलीं। मार्ग में कड़ी धूप थी, इसलिए वे एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगीं। उसी पेड़ पर गरुड़ पंखिनी का घोंसला था। उसमें छोटे-छोटे बच्चे थे। तभी एक सांप उन बच्चों को खाने के लिए पेड़ पर चढ़ने लगा। छोटी बहू ने तुरंत साहस किया और उन बच्चों को बचा लिया। जब गरुड़ पंखिनी लौटी तो पहले उसे भ्रम हुआ, परंतु सत्य जानकर वह बहुत प्रसन्न हुई। उसने कृतज्ञ होकर सुरही गाय और छोटी बहू को अपनी पीठ पर बैठाया और उन्हें शीघ्र स्याहू माता के पास पहुंचा दिया।
स्याहू माता अपनी सहेली सुरही गाय को देखकर प्रसन्न हुईं। बातचीत के समय स्याहू माता ने कहा कि मेरे सिर में बहुत खुजली हो रही है। छोटी बहू ने प्रेम से उनकी सेवा की और उनके सिर की जुएं निकाल दीं। स्याहू माता उसकी सेवा से प्रसन्न हो गईं। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि बेटी, तेरे सात बेटे और सात बहुएं हों।
यह सुनकर छोटी बहू रो पड़ी। उसने कहा कि माता, मेरा तो एक भी बेटा जीवित नहीं है। आपके श्राप को मैंने अपनी ननद के लिए अपने ऊपर लिया था। तब स्याहू माता को पूरी बात समझ में आ गई। उन्होंने कहा कि तूने सेवा, त्याग और सत्य से मेरा मन जीत लिया है। मेरा आशीर्वाद खाली नहीं जाएगा। तू घर जा। तेरे सातों बेटे जीवित होंगे और तेरा घर फिर से भरा-पूरा होगा।
छोटी बहू घर लौटी तो उसने देखा कि अहोई माता और स्याहू माता की कृपा से उसके सातों बेटे जीवित हैं और घर आनंद से भरा हुआ है। उसने श्रद्धा से अहोई माता का उजमन किया। सात अहोई बनाई, पूजा की, कड़ाही की और सबको प्रसाद दिया। जो घर पहले शोक में था, वह मंगल और उत्सव से भर गया।
भक्तों, इस कथा में छोटी बहू का त्याग, गौ सेवा, जीव रक्षा, सच्ची सेवा और माता की कृपा का संदेश है। जो भक्त अहोई माता की कथा श्रद्धा से सुनता है, जो माता अपनी संतान की रक्षा के लिए व्रत करती है, और जो सेवा, दया और सत्य का मार्ग अपनाता है, उस पर अहोई माता की कृपा बनी रहती है।
प्रेम से बोलिए अहोई माता की जय। स्याहू माता की जय। सुरही गौ माता की जय।
भक्तों, अहोई अष्टमी के दिन माताएं अपनी संतान की रक्षा, दीर्घायु और सुख के लिए व्रत रखती हैं। इस व्रत की कई लोक-परंपराएं प्रचलित हैं। अब श्रद्धा और शांत मन से अहोई अष्टमी की वह प्रसिद्ध कथा सुनिए, जिसमें छोटी बहू के त्याग, सेवा और माता की कृपा का वर्णन है।
प्राचीन काल में एक नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात बेटे, सात बहुएं और एक लाडली कुंवारी बेटी थी। दीपावली से पहले घर की लिपाई-पुताई के लिए मिट्टी लाने की परंपरा थी। कार्तिक कृष्ण अष्टमी के दिन साहूकार की सातों बहुएं अपनी ननद के साथ जंगल में मिट्टी खोदने गईं।
जहां वे मिट्टी खोद रही थीं, वहीं एक स्याहू माता की मांद थी। उस मांद में स्याहू माता अपने बच्चों के साथ रहती थीं। मिट्टी खोदते समय ननद के हाथ से अनजाने में स्याहू माता का एक बच्चा मर गया। स्याहू माता बहुत दुखी और क्रोधित हुईं। उन्होंने कहा कि तूने मेरे बच्चे को मारा है, अब मैं तेरी कोख बांध दूंगी।
ननद यह सुनकर डर गई। वह अपनी भाभियों से बोली कि भाभी, तुममें से कोई मेरे बदले यह दोष और श्राप अपने ऊपर ले लो। बड़ी भाभियों ने मना कर दिया। छोटी बहू दयालु थी। उसने सोचा कि ननद अभी कुंवारी है। यदि उसकी कोख बंध गई तो उसका भविष्य दुखमय हो जाएगा। ननद की रक्षा के लिए छोटी बहू ने वह श्राप अपने ऊपर ले लिया।
श्राप का प्रभाव यह हुआ कि छोटी बहू को जब भी संतान होती, वह सातवें दिन मृत्यु को प्राप्त हो जाती। इस प्रकार उसके सात पुत्र जन्म लेकर चले गए। छोटी बहू अत्यंत दुखी हुई। उसने एक पंडित से उपाय पूछा। पंडित जी ने कहा कि तू सुरही गाय की सेवा कर। उसकी कृपा से तुझे मार्ग मिलेगा।
छोटी बहू प्रतिदिन प्रातः उठकर बिना किसी को बताए सुरही गाय के स्थान पर जाती। वह वहां सफाई करती, सेवा करती और चुपचाप लौट आती। कई दिनों तक ऐसा होता रहा। एक दिन सुरही गौ माता ने सोचा कि कौन मेरी इतनी प्रेम से सेवा करता है। अगली सुबह उन्होंने छोटी बहू को सेवा करते देखा। गौ माता प्रसन्न हुईं और बोलीं कि बेटी, तूने मेरी सच्ची सेवा की है, बता तुझे क्या चाहिए।
छोटी बहू ने हाथ जोड़कर कहा कि माता, स्याहू माता आपकी सहेली हैं। उनके श्राप के कारण मेरी संतान जीवित नहीं रहती। यदि आप मुझे उनसे मिलवा दें और वे प्रसन्न हो जाएं, तो मेरी संतान बच सकती है। सुरही गौ माता ने करुणा करके उसे अपने साथ स्याहू माता के पास ले चलने का वचन दिया।
गौ माता छोटी बहू को लेकर चलीं। मार्ग में कड़ी धूप थी, इसलिए वे एक पेड़ के नीचे विश्राम करने लगीं। उसी पेड़ पर गरुड़ पंखिनी का घोंसला था। उसमें छोटे-छोटे बच्चे थे। तभी एक सांप उन बच्चों को खाने के लिए पेड़ पर चढ़ने लगा। छोटी बहू ने तुरंत साहस किया और उन बच्चों को बचा लिया। जब गरुड़ पंखिनी लौटी तो पहले उसे भ्रम हुआ, परंतु सत्य जानकर वह बहुत प्रसन्न हुई। उसने कृतज्ञ होकर सुरही गाय और छोटी बहू को अपनी पीठ पर बैठाया और उन्हें शीघ्र स्याहू माता के पास पहुंचा दिया।
स्याहू माता अपनी सहेली सुरही गाय को देखकर प्रसन्न हुईं। बातचीत के समय स्याहू माता ने कहा कि मेरे सिर में बहुत खुजली हो रही है। छोटी बहू ने प्रेम से उनकी सेवा की और उनके सिर की जुएं निकाल दीं। स्याहू माता उसकी सेवा से प्रसन्न हो गईं। उन्होंने आशीर्वाद दिया कि बेटी, तेरे सात बेटे और सात बहुएं हों।
यह सुनकर छोटी बहू रो पड़ी। उसने कहा कि माता, मेरा तो एक भी बेटा जीवित नहीं है। आपके श्राप को मैंने अपनी ननद के लिए अपने ऊपर लिया था। तब स्याहू माता को पूरी बात समझ में आ गई। उन्होंने कहा कि तूने सेवा, त्याग और सत्य से मेरा मन जीत लिया है। मेरा आशीर्वाद खाली नहीं जाएगा। तू घर जा। तेरे सातों बेटे जीवित होंगे और तेरा घर फिर से भरा-पूरा होगा।
छोटी बहू घर लौटी तो उसने देखा कि अहोई माता और स्याहू माता की कृपा से उसके सातों बेटे जीवित हैं और घर आनंद से भरा हुआ है। उसने श्रद्धा से अहोई माता का उजमन किया। सात अहोई बनाई, पूजा की, कड़ाही की और सबको प्रसाद दिया। जो घर पहले शोक में था, वह मंगल और उत्सव से भर गया।
भक्तों, इस कथा में छोटी बहू का त्याग, गौ सेवा, जीव रक्षा, सच्ची सेवा और माता की कृपा का संदेश है। जो भक्त अहोई माता की कथा श्रद्धा से सुनता है, जो माता अपनी संतान की रक्षा के लिए व्रत करती है, और जो सेवा, दया और सत्य का मार्ग अपनाता है, उस पर अहोई माता की कृपा बनी रहती है।
प्रेम से बोलिए अहोई माता की जय। स्याहू माता की जय। सुरही गौ माता की जय।
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व्रत सम्पन्न
आपकी श्रद्धा और संकल्प स्वीकार हों। 🙏
अहोई माता की आरती
जय अहोई माता, जय अहोई माता।
तुमको निशिदिन सेवत हरि विष्णु विधाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला, तू ही है जगमाता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
माता रूप निरंजन, सुख-सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, नित मंगल आता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
तू ही पाताल वसंती, तू ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव प्रकाशक, जगनिधि से त्राता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
जिस घर थारो बासो, वाही में गुण आता।
कर न सके सोई कर ले, मन नहीं घबराता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
तुम बिन सुख न होवे, पुत्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, तुम बिन नहीं आता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
शुभ गुण सुंदर मुक्ता, क्षीरनिधि जाता।
रत्न चतुर्दश तोकूं, कोई नहीं पाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
श्री अहोई माँ की आरती, जो कोई भी गाता।
उर उमंग अति उपजे, पाप उतर जाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
तुमको निशिदिन सेवत हरि विष्णु विधाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
ब्रह्माणी, रुद्राणी, कमला, तू ही है जगमाता।
सूर्य-चन्द्रमा ध्यावत, नारद ऋषि गाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
माता रूप निरंजन, सुख-सम्पत्ति दाता।
जो कोई तुमको ध्यावत, नित मंगल आता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
तू ही पाताल वसंती, तू ही शुभदाता।
कर्म-प्रभाव प्रकाशक, जगनिधि से त्राता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
जिस घर थारो बासो, वाही में गुण आता।
कर न सके सोई कर ले, मन नहीं घबराता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
तुम बिन सुख न होवे, पुत्र न कोई पाता।
खान-पान का वैभव, तुम बिन नहीं आता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
शुभ गुण सुंदर मुक्ता, क्षीरनिधि जाता।
रत्न चतुर्दश तोकूं, कोई नहीं पाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
श्री अहोई माँ की आरती, जो कोई भी गाता।
उर उमंग अति उपजे, पाप उतर जाता॥
मैया जय अहोई माता, जय जय अहोई माता॥
आशीर्वाद
जिस भाव और श्रद्धा से आपने यह व्रत धारण किया, वह सफल हो। आपके घर में सुख, समृद्धि, आरोग्य और शांति का वास हो। ॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥