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अजा एकादशी व्रत कथा

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🌺विधि
📖कथा
आरती

अजा एकादशी व्रत कथा

📅 Bhadrapada Krishna Paksha Ekadashi

🕯️ व्रत का भाव

व्रत केवल उपवास नहीं, संकल्प और श्रद्धा का संगम है। कुछ क्षण शांत बैठें, गहरी साँस लें और मन को एकाग्र करें। सच्चे भाव से लिया गया व्रत ही फल देता है।

साँस लें

🙏 व्रत संकल्प

अपना नाम व स्थान भरें और संकल्प मन में दोहराएँ — “मैं यह व्रत श्रद्धा और भक्ति से धारण करता/करती हूँ।”

आज, [स्थान] में, मैं [नाम], पूर्ण श्रद्धा और भक्ति के साथ अजा एकादशी व्रत कथा धारण करता/करती हूँ। माता-पिता, परिवार और प्रियजनों के कल्याण, सुख और मंगल की कामना करता/करती हूँ।

🌺 अजा एकादशी पूजा विधि

व्रत आरंभ करने से पूर्व यह विधि पढ़ें — पूजा की तैयारी, नियम और क्रम।

प्रातः स्नान करके भगवान विष्णु का संकल्प लें। पीले वस्त्र, तुलसी दल, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें। अजा एकादशी की कथा सुनें। दिनभर व्रत रखें, रात्रि में भगवान का नाम-स्मरण और जागरण करें। द्वादशी तिथि को विधिपूर्वक पारण करें।
🙏

कथा श्रवण करें

दीपक जलाएँ, शांत मन से बैठें और श्रद्धापूर्वक कथा सुनें।

प्रेम से बोलिए श्री हरि विष्णु भगवान की जय। हृषीकेश भगवान की जय। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की जय।

भक्तों, भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी को अजा एकादशी कहा जाता है। यह व्रत भगवान विष्णु के हृषीकेश स्वरूप को समर्पित है। ऐसा माना जाता है कि इस व्रत के प्रभाव से मनुष्य के पूर्व जन्म और इस जन्म के पाप नष्ट होते हैं, दुख दूर होते हैं और जीवन में फिर से धर्म, सत्य और सुख की स्थापना होती है। अब श्रद्धा से अजा एकादशी की पावन व्रत कथा सुनिए।

प्राचीन काल में अयोध्या नगरी में सूर्यवंश के महान प्रतापी राजा हरिश्चंद्र राज्य करते थे। वे सत्य के पालन में अडिग थे। उनके राज्य में धर्म, न्याय और दया का पालन होता था। वे प्रजा को अपनी संतान के समान मानते थे और कभी असत्य नहीं बोलते थे। उनकी सत्यनिष्ठा की कीर्ति तीनों लोकों में प्रसिद्ध थी।

ईश्वर की लीला से राजा हरिश्चंद्र के जीवन में बड़ा कठिन समय आया। ऋषि विश्वामित्र को दिए वचन के कारण उन्हें अपना राज्य, धन और वैभव छोड़ना पड़ा। वचन की रक्षा के लिए उन्होंने अपनी पत्नी तारामती और पुत्र रोहिताश्व तक को बेच दिया। अंत में स्वयं राजा हरिश्चंद्र श्मशान में चांडाल के सेवक बनकर काम करने लगे। उनका कर्तव्य था कि जो भी मृत शरीर श्मशान में लाया जाए, उसका दाह-संस्कार शुल्क लेकर ही किया जाए।

भक्तों, सत्य की परीक्षा बहुत कठोर होती है। एक दिन उनके पुत्र रोहिताश्व को सर्प ने डस लिया और उसकी मृत्यु हो गई। रानी तारामती अपने मृत पुत्र को लेकर श्मशान पहुंचीं। रात का समय था, हृदय शोक से टूटा हुआ था, परंतु श्मशान का सेवक अपने धर्म पर खड़ा था। राजा हरिश्चंद्र ने अपनी ही पत्नी से कहा कि बिना शुल्क दिए दाह-संस्कार नहीं हो सकता। रानी ने रोते हुए कहा कि मेरे पास कुछ भी नहीं है। तब भी राजा ने धर्म और कर्तव्य नहीं छोड़ा। वे भीतर से टूट चुके थे, लेकिन सत्य से विचलित नहीं हुए।

इसी दुखद समय में महर्षि गौतम वहां आए। उन्होंने राजा हरिश्चंद्र की दशा देखी। राजा ने folded hands से पूछा, हे मुनिवर, ऐसा कौन सा उपाय है जिससे मेरे पाप, दुख और यह भारी संकट दूर हो सके। महर्षि गौतम ने कहा, राजन, भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अजा एकादशी अत्यंत पुण्यदायी है। इस दिन भगवान विष्णु के हृषीकेश स्वरूप का व्रत और पूजन करो। यह व्रत बड़े-बड़े पापों को नष्ट करता है और मनुष्य को दुख-सागर से पार कराता है।

राजा हरिश्चंद्र ने श्रद्धा से अजा एकादशी का व्रत किया। उन्होंने भगवान विष्णु का ध्यान किया, निराहार रहकर पूजा की, कथा सुनी, रात्रि में जागरण किया और बार-बार श्री हरि से प्रार्थना की कि हे प्रभु, यदि मैंने जीवन में सत्य का पालन किया है, तो मेरे दुख दूर करें और मुझे धर्म-मार्ग पर स्थिर रखें।

व्रत के प्रभाव से भगवान विष्णु की कृपा हुई। राजा हरिश्चंद्र की परीक्षा पूर्ण हुई। देवताओं ने प्रकट होकर कहा कि राजन, तुम सत्य के पालन में सफल हुए हो। तुम्हारी कीर्ति अमर रहेगी। उसी समय उनका पुत्र रोहिताश्व जीवित हो गया, रानी तारामती का दुख दूर हुआ और राजा हरिश्चंद्र को उनका राज्य, परिवार और सम्मान फिर से प्राप्त हुआ। अंत में उन्हें उत्तम लोक की प्राप्ति हुई।

भक्तों, अजा एकादशी की यह कथा हमें सिखाती है कि सत्य, धर्म और भगवान पर विश्वास कभी व्यर्थ नहीं जाता। जीवन में चाहे कितना भी बड़ा दुख आए, जो भक्त श्रद्धा से अजा एकादशी का व्रत करता है और भगवान विष्णु का स्मरण करता है, उसके पाप नष्ट होते हैं, संकट दूर होते हैं और जीवन में धर्म, सुख और शांति की प्राप्ति होती है।

प्रेम से बोलिए श्री हरि विष्णु भगवान की जय। हृषीकेश भगवान की जय। सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र की जय।
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व्रत सम्पन्न

आपकी श्रद्धा और संकल्प स्वीकार हों। 🙏

🪔

श्री विष्णु जी की आरती

ॐ जय जगदीश हरे, स्वामी जय जगदीश हरे।
भक्त जनों के संकट, दास जनों के संकट, क्षण में दूर करे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

जो ध्यावे फल पावे, दुख बिनसे मन का।
सुख-संपत्ति घर आवे, कष्ट मिटे तन का॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

मात-पिता तुम मेरे, शरण गहूं किसकी।
तुम बिन और न दूजा, आस करूं जिसकी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम पूरन परमात्मा, तुम अंतर्यामी।
पारब्रह्म परमेश्वर, तुम सबके स्वामी॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम करुणा के सागर, तुम पालनकर्ता।
मैं मूरख खल कामी, कृपा करो भर्ता॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

तुम हो एक अगोचर, सबके प्राणपति।
किस विधि मिलूं दयामय, तुमको मैं कुमति॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

दीनबंधु दुखहर्ता, तुम ठाकुर मेरे।
अपने हाथ उठाओ, द्वार पड़ा तेरे॥
ॐ जय जगदीश हरे॥

विषय विकार मिटाओ, पाप हरो देवा।
श्रद्धा-भक्ति बढ़ाओ, संतन की सेवा॥
ॐ जय जगदीश हरे॥
आशीर्वाद
जिस भाव और श्रद्धा से आपने यह व्रत धारण किया, वह सफल हो। आपके घर में सुख, समृद्धि, आरोग्य और शांति का वास हो। ॥ सर्वे भवन्तु सुखिनः ॥