MahabharataShanti Parva

Mahabharata Shanti Parva – [भीस्म] नारदॊवाच नमस ते देवदेव [1] निष्क्रिय [2] न

Shloka (श्लोक)

[भीस्म]नारदॊवाच
नमस ते देवदेव [1] निष्क्रिय [2] निर्गुण [3] लॊकसाक्षिन [4] कषेत्रज्ञ [5] अनन्त [6116] पुरुष [7] महापुरुष [8] तरिगुण [9] परधान [10]अमृत [11] वयॊम [12] सनातन [13] सदसद्व्यक्ताव्यक्त [14] ऋतधामन [15] पूर्वादिदेव [16] वसुप्रद [17] परजापते [18] सुप्रजापते [19] वनस्पते [20]महाप्रजापते [21] ऊर्जस्पते [22] वाचस्पते [23] मनस्पते [24] जगत्पते [25] दिवस्पते [26] मरुत्पते [27] सलिलपते [28] पृथिवीपते [29] दिक पते [30]पूर्वनिवास [31] बरह्मपुरॊहित [32] बरह्मकायिक [33] महाकायिक [34] महाराजिक [35] चतुर्महाराजिक [36] आभासुर [37] महाभासुर [38] सप्तमहाभासुर [39] याम्य [40]महायाम्य [41] संज्ञासंज्ञ [42] तुषित [43] महातुषित [44] परतर्दन [45] परिनिर्मित [46] वशवर्तिन [47] अपरिनिर्मित [48] यज्ञ [49] महायज्ञ [50]यज्ञसंभव [51] यज्ञयॊने [52] यज्ञगर्भ [53] यज्ञहृदय [54] यज्ञस्तुत [55] यज्ञभागहर [56] पञ्चयज्ञधर [57] पञ्चकालकर्तृगते [58] पञ्चरात्रिक [59] वैकुण्ठ [60]अपराजित [61] मानसिक [62] परमस्वामिन [63] सुस्नात [64] हंस [65] परमहंस [66] परमयाज्ञिक [67] सांख्ययॊग [68] अमṛतेशय [69] हिरण्येशय [70]वेदेशय [71] कुशेशय [72] बरह्मेशय [73] पद्मेशय [74] विश्वेश्वर [75] तवं जगदन्वयः [76] तवं जगत्प्रकृतिः [77] तवाग्निर आस्यं [78] वडवामुखॊ ऽगनिः [79] तवम आहुतिः [80]तवं सारथिः [81] तवं वषट्कारः [82] तवम ओंकारः [83] तवं मनः [84] तवं चन्द्रमाः [85] तवं चक्षुराद्यम [86] तवं सूर्यः [87] तवं दिशां गजः [88] दिग्भानॊ [89] हयशिरः [90]परथमत्रिसौपर्ण [91] पञ्चाग्ने [92] तरिणाचिकेत [93] षडङ्गविधान [94] पराग्ज्यॊतिष [95] जयेष्ठसामग [96] सामिकव्रतधर [97] अथर्वशिरः [98] पञ्चमहाकल्प [99] फेनपाचार्य [100]वालखिल्य [101] वैखानस [102] अभग्नयॊग [103] अभग्नपरिसंख्यान [194] युगादे [105] युगमध्य [106] युगनिधन [107] आखण्डल [108] पराचीनगर्भ [109] कौशिक [110]पुरुष्टुत [111] पुरुहूत [112] विश्वरूप [113] अनन्तगते [114] अनन्तभॊग [115] अनन्त [1166] अनादे [117] अमध्य [118] अव्यक्तमध्य [119] अव्यक्तनिधन [120]वरतावास [121] समुद्राधिवास [122] यशॊवास [123] तपॊवास [124] लक्ष्म्यावास [125] विद्यावास [126] कीर्त्यावास [127] शरीवास [128] सर्वावास [129] वासुदेव [130]सर्वच्छन्दक [131] हरिहय [132] हरिमेध [133] महायज्ञभागहर [134] वरप्रद [135157] यमनियममहानियमकृच्छ्रातिकृच्छ्रमहाकृच्छ्रसर्वकृच्छ्रनियमधर [136] निवृत्तधर्मप्रवचनगते [137] परवृत्तवेदक्रिय [138] अज [139] सर्वगते [140]सर्वदर्शिन [141] अग्राह्य [142] अचल [143] महाविभूते [144] माहात्म्यशरीर [145] पवित्र [146] महापवित्र [147] हिरण्मय [148] बृहत [149] अप्रतर्क्य [150]अविज्ञेय [151] बरह्माग्र्य [152] परजासर्गकर [153] परजानिधनकर [154] महामायाधर [155] चित्रशिखण्डिन [156] वरप्रद [157135] पुरॊडाशभागहर [158] गताध्वन [159] छिन्नतृष्ण [160]छिन्नसंशय [161] सर्वतॊनिवृत्त [162] बराह्मणरूप [163] बराह्मणप्रिय [164] विश्वमूर्ते [165] महामूर्ते [166] बान्धव [167] भक्तवत्सल [168] बरह्मण्यदेव [169] भक्तॊ ऽहं तवां दिदृष्कुः [170] एकान्तदर्शनाय नमॊ नमः [171]

⚡ Quick Meaning

Narada proclaims extensive praises to the divine, recognizing the formless and infinite nature of the supreme being.

Translations

English Translation

This verse presents an elaborate invocation where Narada expresses reverence to the Supreme Lord, acknowledging him by numerous attributes and names. It invokes the essence of divinity, transcendence, and interconnectedness, emphasizing the infinite nature of existence and the ultimate consciousness behind creation.

हिंदी अनुवाद

यह श्लोक एक विस्तृत प्रार्थना प्रस्तुत करता है जिसमें नारद परमेश्वर के प्रति श्रद्धा व्यक्त करते हैं और उन्हें कई गुणों और नामों से स्मरण करते हैं। यह दिव्य के सार, अतिक्रमण, और आपसी संबंध को दर्शाता है, और सृष्टि के पीछे की अंतिम चेतना की अनंतता पर जोर देता है।

Commentary

Context

This shloka is a great invocation from the Shanti Parva, highlighting the significance of praising the divine while recognizing the formless nature of God.

Meaning

This verse conveys the multi-faceted nature of divinity, encouraging seekers to understand the ultimate reality beyond forms, leading to a deeper spiritual connection.

Application

One can practice this teaching by regularly engaging in forms of devotion, recognizing the divine presence in various forms while acknowledging the underlying unity of existence.

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